पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन का 26वाँ शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ।
प्रमुख बिंदु
- यह शिखर सम्मेलन शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना की 25वीं वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित किया गया।
- इस वर्ष के शिखर सम्मेलन की विषय-वस्तु ‘SCO के 25 वर्ष: सतत शांति, विकास और समृद्धि की दिशा में साथ-साथ’ रही।
- सम्मेलन का समापन आतंकवाद-रोधी प्रयासों, जलवायु कार्रवाई, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और डिजिटल सहयोग से संबंधित महत्वपूर्ण परिणामों के साथ हुआ।
- बिश्केक घोषणा: शिखर सम्मेलन में ऐतिहासिक बिश्केक घोषणा को अपनाया गया।
- अंग्रेज़ी को शंघाई सहयोग संगठन की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया गया।
- नेताओं ने सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए सुरक्षा खतरों से निपटने हेतु एक सार्वभौमिक केंद्र स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की।
- मादक पदार्थों की तस्करी से निपटना: कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय तथा वर्ष 2030 तक मादक पदार्थों के व्यसन से निपटने के लिए एक सहयोग कार्यक्रम पर सहमति बनी।
- ये उपाय सीमा-पार मादक पदार्थों की तस्करी और मादक पदार्थ-आधारित आतंकवाद के विरुद्ध भारत के प्रयासों को समर्थन प्रदान करते हैं।
- सम्मेलन में संगठन की गैर-सैन्य प्रकृति पर बल दिया गया। साथ ही कहा गया कि इसके सदस्य गुट-आधारित और टकरावपूर्ण तरीकों को अस्वीकार करने वाले दृष्टिकोण का पालन करते हैं।
- सम्मेलन में शंघाई सहयोग संगठन तथा अफ्रीकी संघ आयोग के बीच अधिक निकट सहयोग को भी मंजूरी दी गई।
- लाहौर, पाकिस्तान को वर्ष 2026-27 के लिए संगठन की पर्यटन एवं सांस्कृतिक राजधानी घोषित किया गया।
- पाकिस्तान, किर्गिस्तान से संगठन की अध्यक्षता ग्रहण करेगा और वर्ष 2027 में राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की आगामी बैठक की मेजबानी करेगा।
शंघाई सहयोग संगठन
- शंघाई फाइव का गठन वर्ष 1996 में चीन और पूर्व सोवियत संघ के चार गणराज्यों के बीच सीमा निर्धारण तथा सैन्य-विसैन्यीकरण संबंधी वार्ताओं की एक श्रृंखला के परिणामस्वरूप हुआ।
- कजाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान इसके सदस्य थे।
- वर्ष 2001 में उज्बेकिस्तान के संगठन में शामिल होने के बाद शंघाई फाइव का नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन कर दिया गया।
- उद्देश्य: मध्य एशियाई क्षेत्र में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद पर अंकुश लगाने के प्रयासों हेतु क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
- सदस्य (10): चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस तथा मध्य एशिया के चार देश—कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान।
- भारत वर्ष 2017 में पूर्ण सदस्य बना और वर्ष 2023 में घूर्णन अध्यक्षता ग्रहण की।
- सदस्य देश मिलकर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30% तथा विश्व की कुल जनसंख्या में लगभग 40% का योगदान करते हैं।
- पर्यवेक्षक देश: अफगानिस्तान और मंगोलिया।
- भाषा: संगठन की आधिकारिक भाषाएँ रूसी और चीनी थीं। 26वें शिखर सम्मेलन में अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा के रूप में जोड़ा गया।
- संगठन का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय राष्ट्राध्यक्षों की परिषद है, जिसकी बैठक वर्ष में एक बार होती है।
- संगठन के दो स्थायी निकाय हैं—बीजिंग स्थित सचिवालय तथा ताशकंद स्थित क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना की कार्यकारी समिति।
भारत के लिए महत्त्व
- क्षेत्रीय सुरक्षा: शंघाई सहयोग संगठन आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद सहित सुरक्षा संबंधी चिंताओं को संबोधित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है, जो भारत के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं।
- संगठन की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना के माध्यम से भारत खुफिया जानकारी साझा करने तथा आतंकवाद-रोधी प्रयासों में सहयोग करता है।
- चीन और पाकिस्तान के बीच संतुलन: यद्यपि चीन और पाकिस्तान दोनों संगठन के सदस्य हैं, फिर भी यह मंच भारत को अपनी स्थिति प्रभावी ढंग से रखने तथा भारत-विरोधी आख्यानों के निर्माण को रोकने का अवसर प्रदान करता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: मध्य एशिया तेल, गैस और यूरेनियम जैसे ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध है। संगठन की सदस्यता भारत को इन देशों के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करती है।
- आर्थिक सहयोग: यह संगठन सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को सुगम बनाता है, जिससे भारत के लिए, विशेषकर मध्य एशियाई देशों के साथ, व्यापार एवं निवेश के अवसरों में वृद्धि होती है।
- मध्य एशिया: शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी सदस्यता और प्राथमिकताएँ मध्य एशिया पर केंद्रित हैं। भारत इस क्षेत्र के साथ अपने संबंधों को व्यापक बनाना चाहता है, लेकिन क्षेत्र तक सीधी पहुँच के संदर्भ में उसे एक अंतर्निहित भौगोलिक बाधा का सामना करना पड़ता है।
चुनौतियाँ
- चीन-पाकिस्तान धुरी: संगठन के अंदर चीन और पाकिस्तान के बीच सुदृढ़ साझेदारी भारत की रणनीतिक स्थिति को जटिल बनाती है, क्योंकि कई बार यह क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चर्चाओं में भारत के प्रभाव को सीमित करती है।
- भू-राजनीतिक तनाव: चीन और पाकिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद तथा भू-राजनीतिक तनाव संगठन की चर्चाओं को भी प्रभावित करते हैं, जिससे भारत के लिए रचनात्मक रूप से सहभागिता करना कठिन हो जाता है।
- आर्थिक विकास की तुलना में सुरक्षा पर अधिक ध्यान: संगठन का सुरक्षा मुद्दों पर प्राथमिक ध्यान कभी-कभी आर्थिक और विकासात्मक सहयोग को पीछे छोड़ देता है, जबकि ये भारत के क्षेत्रीय हितों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- संस्थागत सीमाएँ: संगठन में निर्णय-निर्माण सर्वसम्मति-आधारित है, जिसके कारण प्रमुख मुद्दों पर प्रगति की गति धीमी हो सकती है।
निष्कर्ष
- शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए यूरेशियाई शक्तियों के साथ जुड़ने, क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने, अपने आर्थिक एवं ऊर्जा हितों को सुरक्षित करने तथा आतंकवाद-रोधी सहयोग को मजबूत करने का एक रणनीतिक मंच है।
- चुनौतियों के बावजूद, भारत संगठन का उपयोग “क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास” (SAGAR) के अपने दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने तथा पश्चिमी गठबंधनों के लिए एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में करता है।
स्रोत: AIR
Previous article
संक्षिप्त समाचार 01-09-2026
Next article
भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026